बांग्लादेश चुनाव: चुनाव परिणाम और जनमत संग्रह के नतीजे कैसे रहे?
शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026
बांग्लादेश चुनाव आयोग ने 13वें संसदीय चुनाव की 297 सीटों के अंतिम परिणाम घोषित कर दिए हैं।
चुनाव आयोग के सचिव अख़्तर अहमद ने शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026 को दोपहर बाद अगरगांव स्थित चुनाव आयोग के दफ़्तर में परिणामों की घोषणा की।
इन चुनावों में अकेले बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने 209 सीटें जीत ली हैं।
बीएनपी और उसके सहयोगी दलों को कुल 212 सीटों पर जीत मिली है।
जबकि बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी ने 68 सीटें जीती हैं और उसके सहयोगी दलों को भी नौ सीटों पर जीत मिली है।
वहीं एनसीपी ने छह और बांग्लादेश ख़लीफ़ा मजलिस ने दो सीटें जीतीं।
इनके अलावा पांच पार्टियों - इस्लामी आंदोलन, गण-अधिकार परिषद, बांग्लादेश जातीय पार्टी, गण संघति आंदोलन और ख़िलाफ़त मजलिस ने एक-एक सीट जीती हैं।
इन चुनावों में सात सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी जीत हासिल की।
चुनाव आयोग के मुताबिक़, चटगांव की दो सीटों के नतीजे तब तक आधिकारिक नहीं होंगे जब तक कि इन सीटों से जुड़े मामले की अपील का कोर्ट में निपटारा नहीं हो जाता।
बीएनपी के सरवर आलमगीर ने चटगांव-2 (फतीकछड़ी) निर्वाचन क्षेत्र से अनौपचारिक रूप से जीत हासिल की है और बीएनपी के असलम चौधरी ने चटगांव-4 (सीताकुंडा) निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की है।
जनमत संग्रह के नतीजे कैसे रहे?
चुनाव आयोग के सचिव ने यह भी कहा कि जनमत संग्रह में क़रीब पांच करोड़ लोगों ने 'हां' के पक्ष में वोट दिया।
जबकि इससे क़रीब आधे लोगों ने ही जनमत संग्रह के लिए ‘नहीं’ का विकल्प चुना है।
बांग्लादेश में नई सरकार चुनने के साथ ही मतदाताओं ने 'जुलाई चार्टर' पर आधारित संवैधानिक जनमत संग्रह पर भी अपना वोट डाला है।
जुलाई चार्टर में बताया गया है कि बांग्लादेश पर कैसे शासन किया जाएगा? इसका मक़सद संवैधानिक सुधार कर कार्यपालिका में केंद्रित अधिकार को कम करना है।
इसके साथ ही शासन की विभिन्न शाखाओं के बीच नियंत्रण और संतुलन को मज़बूत करना, और उस राजनीतिक प्रभुत्व को रोकना है जो हाल के दशकों में देश में दिखा है।
इस चार्टर में बांग्लादेश की संस्थाओं की भूमिका बताई गई है। इसमें ऊपरी और निचले सदन वाली यानी दो सदनों वाली संसद बनाने का सुझाव दिया गया है; और उन सुधारों की सूची दी गई है जिन्हें नई सरकार को लागू करना होगा।
इस जनमत संग्रह में 'हां' वोट मिलने के बाद नई संसद कानूनी रूप से 84 सुधारों को लागू करने के लिए बाध्य होगी।
अगर इस पर 'नहीं' में ज़्यादा वोटिंग होती तो जुलाई चार्टर अगली सरकार पर बाध्यकारी नहीं होता, और सुधार पूरी तरह से बहुमत वाली पार्टी की इच्छा पर निर्भर होता।
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